Jay shri ram : जानें श्रीराम का चमत्कारी विजय-मंत्र

नमस्कार दोस्तों ! हमारे ब्लॉग पोस्ट Jay shri ram में आपका हार्दिक स्वागत है। राम, एक ऐसा शब्द जो एक जीवात्मा के अपनी माता के गर्भ के भीतर अस्तित्व में आने पर उस आत्मा में चेतना का संचार करता है तथा उसी जीवात्मा के अंत समय में भी जिस समय वह निष्प्राण हो जाती है, उसके साथ-साथ चलता है।

जितना प्राचीन हमारा सनातन धर्म है उतना ही प्राचीन है यह आलौकिक, दिव्य तथा पवित्र नाम। राम अर्थात ईश्वर, राम अर्थात मर्यादा पुरूषोत्तम, राम अर्थात जो घट-घट में रमता है, वही राम है। कहते हैं कि सबसे पहले “ श्रीराम जय राम जय जय राम ”  मंत्र नारदजी ने हनुमानजी को दिया था इसलिए संकट नाश के लिए इस मंत्र का जप मनुष्य को अवश्य ही करना चाहिए। यह मंत्र मंत्रराज भी कहलाता है क्योंकि यह उच्चारण करने में अत्यंत सरल है।

इसमें देश, काल व पात्र का कोई बंधन नहीं है अर्थात प्रत्येक स्थान, समय तथा  किसी के भी द्वारा इस मंत्र का जाप किया जा सकता है। आज की पोस्ट में हम इस मंत्र की अपार महिमा पर चर्चा करेंगे तो आईये, पोस्ट शुरू करते हैं।

Jay Shri Ram : मंत्र को विजय मंत्र कहने का कारण

यह तारक मंत्र “श्री” से प्रारम्भ होता है जिसको सीता अथवा शक्ति का रूप माना गया है राम शब्द “रा” अर्थात र कार तथा म कार से मिलकर बना है। “रा” अग्नि स्वरूप है जो कि हमारे दुष्कर्मों का दहन करता है। “म” शब्द जल का द्योतक है जो आत्मा की जीवात्मा पर विजय का कारक है।

भिन्न-भिन्न रूपों में मंत्र का वर्णन

प्रत्येक मनुष्य के भीतर सत-रज-तम ये त्रिगुण विद्यमान होते हैं तथा इन्हीं के अनुसार उसकी प्रकृति भी होती है। इन तीनों ही गुणों को साधने अथवा इन तीनों में संतुलन बनाये रखने के लिए निम्न रूपों में इस महामंत्र की साधना की जा सकती है।

१. सतगुण रूप में

निष्काम भाव से यदि इस मंत्र का जाप किया जाये तो साधक अपनी काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार इन पांचों इन्द्रियों के वश में नहीं रहता तथा इन पर विजय प्राप्त कर लेता है।

२. रजोगुण रूप मेंं

भौतिक संसार में प्रत्येक मनुष्य की कुछ-न-कुछ कामना अवश्य ही होती है किसी विशेष कामना पूर्ति के लिए इस महामंत्र का जाप करने से मनुष्य दरिद्रता, दुःखों तथा सभी प्रकार की आपत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है।

३. तमोगुण रूप में

संसार में जीवन-यापन करते हुये मित्र तथा शत्रु दोनों का सामंजस्य होता है। किसी भी प्रकार की शत्रु बाधा, मुकदमें में जीत आदि के लिए इस मंत्र का जप साधक को संसार में विजयी बनाता है और अपने विजय-मंत्र नाम को सार्थक करता है।

समर्थ रामदास जी ने किया जाप

कहते हैं कि समर्थ गुरू रामदासजी ने इस मंत्र का तेरह करोड़ बार जप किया जिससे प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए थे। इसी विजय मंत्र के कारण बजरंगबली को श्रीराम का सान्निध्य तथा कृपा मिली। इस मंत्र में तेरह अक्षर हैं तथा तेरह लाख जप का एक पुरश्चरण माना गया है। इस मंत्र का जप भी कर सकते हैं तथा साथ ही कीर्तन के रूप में इसे गाया भी जा सकता है।

ऋषि विश्वामित्र का क्रोध

लंका विजय के पश्चात अयोध्या नगरी में भगवान श्री राम, देवर्षि नारद, ऋषि विश्वामित्र एवं वशिष्ठ आदि बैठे थे। उस समय नारदजी ने ऋषियों से कहा कि कि यह बताएं कि नाम (भगवान का नाम) तथा नामी (स्वयं भगवान) में श्रेष्ठ कौन है ?

इस पर सभी ऋषियों में वाद-विवाद होने लगा किन्तु इस प्रश्न का सही निष्कर्ष नहीं निकल पाया तब नारदजी ने कहा निश्चय ही भगवान का नाम श्रेष्ठ है तथा इसको सिद्ध भी किया जा सकता है। इस बात को सिद्ध करने के लिए नारदजी ने एक युक्ति निकाली।

उन्होंने हनुमानजी से कहा कि तुम दरबार में जाकर सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम करना किन्तु विश्वामित्र जी को प्रणाम मत करना क्योंकि वे राजर्षि अर्थात राजा से ऋषि बने हैं, अतः वे अन्य ऋषियों की भांति सम्मान के योग्य नहीं है।

हनुमानजी ने दरबार में जाकर नारदजी के बताए अनुसार ही किया। विश्वामित्र हनुमानजी के इस व्यवहार से रुष्ट हो गए। तब नारद ऋषि विश्वामित्र के निकट जाकर बोले -हनुमान कितना उद्दण्ड और घमण्डी हो गया है, आपको छोड़कर उसने सभी को प्रणाम किया?

यह सुनकर तो विश्वामित्र क्रोधित हो गए तथा श्रीराम के पास जाकर बोले तुम्हारे सेवक हनुमान ने सभी ऋषियों के सामने मेरा घोर अपमान किया है, अतः कल सूर्यास्त से पहले उसे तुम्हारे हाथों मृत्युदण्ड मिलना चाहिए।

प्रभु राम का हनुमान जी पर प्रहार

विश्वामित्र जी श्रीराम के गुरु थे अतः श्रीराम को उनकी आज्ञा का पालन करना ही था। श्रीराम, हनुमान को कल मृत्युदण्ड देंगे, यह बात सारे नगर में आग की तरह फैल गई। हनुमान जी नारद जी के पास जाकर बोले -देवर्षि ! मेरी रक्षा कीजिए, प्रभु कल मेरा वध कर देंगे, मैंने तो आपके कहने से ही यह सब किया है।

नारदजी ने हनुमान जी से कहा – तुम निराश मत होओ, मैं जैसा बताऊं, वैसा ही करो। ब्रह्ममूर्त में उठकर सरयू नदी में स्नान करो और फिर नदी-तट पर ही खड़े होकर तारक मंत्र “श्रीराम जय राम जय जय राम” इस मंत्र का जप करते रहना, तुम्हें कुछ नहीं होगा।

दूसरे दिन प्रातः काल हनुमान जी की कठिन परीक्षा देखने के लिए अयोध्यावासियों की भीड़ जमा हो गई। हनुमान जी सूर्यादय से पहले ही सरयू में स्नान कर तट पर हाथ जोड़कर जोर-जोर से श्रीराम जय राम जय जय राम मंत्र का जप करने लगे। Jay shri ram

भगवान श्रीराम हनुमान जी से थोड़ी दूर पर खड़े होकर अपने प्रिय सेवक पर अनिच्छापूर्वक बाणों की बौछार करने लगे। पूरे दिन श्रीराम बाणों की वर्षा करते रहे, पर हनुमानजी का बाल भी बांका नहीं हुआ। अंत में श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र उठाया तो श्री हनुमान भी पूर्ण आत्मसमर्पण कर मुस्कराते हुए जोर-जोर से श्रीराम जय राम जय जय राम का जप करने लगे।

तब नारदजी विश्वामित्र जी के पास जाकर बोले मुने ! आप अपने क्रोध को समाप्त कीजिए, श्रीराम थक चुके हैं, उन्हें हनुमान के वध की गुरु-आज्ञा से मुक्त कीजिए। आपने श्रीराम के नाम की महत्ता को तो प्रत्यक्ष देख ही लिया है, विभिन्न प्रकार के बाण भी हनुमान जी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके अत: अब आप श्रीराम को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से रोकें। Jay shri ram

विश्वामित्र ने वैसा ही किया। हनुमान जी आकर श्रीराम तथा ऋषि विश्वामित्र के चरणों पर गिर पड़े। विश्वामित्र जी ने हनुमानजी को आशीर्वाद देकर उनकी श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति की प्रशंसा की।

राम से बड़ा राम का नाम

गोस्वामी तुलसीदासजी का कहना है राम-नाम राम से भी बड़ा है। राम ने तो केवल अहिल्या को तारा, किन्तु राम-नाम के जप ने करोड़ों दुर्जनों की बुद्धि सुधार दी। समुद्र पर सेतु बनाने के लिए राम को भालू-वानर इकट्ठे करने पड़े, बहुत परिश्रम करना पड़ा, परंतु राम-नाम से अपार भवसिन्धु ही सूख जाता है।

प्रभु राम के छोड़े पत्थर समुद्र में क्यों डूब गये ?

लंका पर आक्रमण के समय जब समुद्र पर सेतु बनाया जा रहा था तब श्री राम लिखे हुये पत्थर समुद्र में तैरने लगे। प्रभु राम ने सोचा कि क्यों न मैं भी समुद्र सेतु के लिए अपना योगदान दूं। ऐसा सोचकर उन्होंने जब समुद्र में पत्थर छोड़ा तो वह तैरने के स्थान पर डूब गया। इसका कारण उन्होंने जामवंत तथा हनुमान जी से पूछा तो वे बोले कि हे प्रभु! आप जिसका सहारा बनते हैं वे तर जाते हैं किन्तु यदि आप ही किसी को छोड़ देंगे वह तो डूबेगा ही, फिर उसे कौन तार सकता है ?

संसार का मूल कारण सत्व, रज तथा तम – ये त्रिगुण हैं। ये तीनों ही भव-बंधन के कारण हैं। इन तीनों पर विजय पाने और संसार से सब कुछ राम का ही मानने की शिक्षा देने के लिए इस मंत्र में तीन बार “राम” और तीन ही बार “जय” शब्द का प्रयोग हुआ है।

मंत्र का जप करते समय मन में यह भाव रहे – भगवान श्रीराम और सीताजी दोनों मिलकर पूर्ण ब्रह्म हैं। हे प्रभु श्रीराम ! मैं आपकी स्तुति करता हूं, मुझ शरणागत पर कृपा कीजिये।

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